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मंगलवार सितम्बर 07

पृथ्वीराज रासो [हिन्दी साहित्य का इतिहास 9] - अजय यादव

Ajay Yadav

पृथ्वीराज रासो संपूर्ण रासो साहित्य का सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ है। कई विद्वान इसे हिन्दी का पहला महाकाव्य और इसके रचयिता चंदबरदाई को पहला महाकवि भी मानते हैं। इसके विपरीत कई अन्य विद्वान इसे पूर्णतया जाली ग्रंथ भी कहते हैं।

इसके रचनाकार चंद के बारे में प्रसिद्ध है कि उनका और पृथ्वीराज चौहान का जन्म भी एक ही दिन हुआ था और मृत्यु भी। वे पृथ्वीराज के अनन्य मित्र, सामन्त और राजकवि सभी कुछ थे।

शिवरीनारायण में रथयात्रा [आलेख] - प्रो. अश्विनी केशरवानी

Kesarvani

महानदी, शिवनाथ और जोंक नदी के त्रिधारा संगम के तट पर स्थित प्राचीन, प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण और ''छत्तीसगढ़ की जगन्नाथपुरी'' के नाम से विख्यात् शिवरीनारायण बिलासपुर से 64 कि. मी., राजधानी रायपुर से बलौदाबाजार से होकर 120 कि. मी., जांजगीर जिला मुख्यालय से 60 कि. मी., कोरबा जिला मुख्यालय से 110 कि. मी. और रायगढ़ जिला मुख्यालय से सारंगढ़ होकर 110 कि. मी. की दूरी पर अवस्थित है। अप्रतिम सौंदर्य और चतुर्भुजी विष्णु की मूर्तियों की अधिकता के कारण स्कंद पुराण में इसे श्री पुरूषोत्तम और श्री नारायण क्षेत्र कहा गया है।

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कतील शिफाई [जीवन परिचय) - अभिषेक सागर

abhishek sagarउर्दू के सुप्रसिद्ध शायर औरंगज़ेब खान उर्फ क़तील शिफ़ाई का जन्म 24 दिसम्बर 1919 को पाकिस्तान के हज़ारा तहसील के हरीपुर में हुआ था। उर्दू गज़ल की दुनिया में अपना नाम उन्होंने अपने उस्ताद हकीम मोहम्मद ‘सिफिया’ के नाम पर शिफ़ाई रख लिया और क़तील उनका तखल्लुस बन गया किसका मतलब ‘वो जिसका कत्ल हो चुका’ है। इस तरह क़तील शिफ़ाई का जन्म हुआ।

प्रकृति का स्वर्ग: अंडमान-निकोबार द्वीप समूह 4[आलेख] - कृष्ण कुमार यादव

साहित्य शिल्पी

लघु अंडमान- पोर्टब्लेयर से 120 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित लघु अंडमान द्वीप में मूलत: निकोबारी, ओंगी और पूर्वी पाकिस्तान से लाकर बसाये गए लोग हैं। यहाँ पर चमकीले रेतीले तट, क्रीक से गुजरती हुई बोटिंग के अलावा झरनों व हाथी की सवारी का भी आनंद उठाया जा सकता है। यहाँ के बटलर बे तट, नेता जी नगर तट व हरमिंदर बे तट प्रसिद्ध हैं तो हट बे से क्रमश: 6.5 व 20 किलोमीटर दूर स्थित व्हाइट सर्फ व व्हिस्पर वेव झरनों का लुत्फ उठाने से कोई नहीं चूकता है।

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धूप कणी (मुक्तक) - शशि पाधा

रचनाकार:शशि पाधा शुक्रवार, जून 18 2010 13:00

Shashi Padha

जिसकी लाली ओढ़ के, लाल हुआ कचनार
छलके उसकी गागरी, अँजुरी भर दो चार

सूना-सूना मन का घर, संशय थे अनेक
खोल झरोखा आन मिली धूप कणी की रेख

पल दो पल संताप से, मन क्यों करता रोष
जलती धरती देख के, बरसे शीतल ओस

सूरज रखूँ हाथ पे, दूर क्षितिज उड़ जाऊँ
दो पग सागर नाप लूँ, रूठा मन बहलाऊँ

कल किसी ने छोड़ा था, दोराहे पे साथ
अनजाना कोई रख गया, आज काँधे हाथ

सतरँगों की ओढ़नी, रँगे न रँगरेज
अठवाँ रँग जो प्रेम का, ओ साईँ तू भेज

नदी कहे किनारे से, मन की बात बताऊँ
तू जो चल दे सँग मेरे, मीलों बहती जाऊँ

धीमे -धीमे चली हवा, सारी सृष्टि मौन
थका बटोही सोया जो,धरती गोदी कौन

रचनाकार परिचय:-
हिंदी और संस्कृत में स्नातकोत्तर शशि पाधा १९६८ में जम्मू कश्मीर विश्वविद्यालय की सर्वश्रेष्ठ महिला स्नातक रहीं हैं। इसके अतिरिक्त सर्वश्रेष्ठ सितार वादन के लिये भी आप सम्मानित हो चुकीं हैं। २००२ में अमेरिका जाने से पूर्व आप भारत में एक रेडियो कलाकार के रूप में कई नाटकों और विचार-गोष्ठियों में भी सम्मिलित रहीं हैं। आपकी रचनायें भी समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। अमेरिका में आप नार्थ कैरोलिना विश्वविद्यालय में हिंदी अध्यापन से जुड़ गईं। अब तक आपके दो काव्य-संकलन “पहली किरण” और “मानस-मन्थन” प्रकाशित हो चुके हैं और एक अन्य प्रकाशनाधीन है। पिछले पाँच वर्षों से आप विभिन्न जाल-पत्रिकाओं से भी प्रकाशित हो रहीं हैं।
 

Comments  

 
0 # अभिषेक सागर 2010-06-18 15:57
अच्छा मुक्तक...बधाई
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0 # Dr.Girish Kumar Verm 2010-06-20 01:51
आपके ये मुक्तक दोहा छंद में हैं।
इन्हें पढ़ कर सुखद अनुभूति हुई।
कुछ दोहों में पदों के थोड़ा परिवर्तन
से मात्राओं की व्यवस्था संतुलित हो
गई है और प्रभावोत्पादकता बढ
गई है। यथा-
"जिसकी लाली ओढ़ के, लाल हुआ कचनार।
छलकी उसकी गागरी, बस अँजुरी दो चार॥१
एकाकी-मन मन सदन में, संशय उगे अनेक।
खुली खिड़कियाँ आ मिली, धूप कणी की रेख॥२
करतल पर रवि को रखूँ, उड़ूं क्षितिज के पार।
नापूँ पग में सिन्धु को, मन के पंख पसार॥३
छोड़ा था कल किसी ने, दोराहे पे साथ।
आज अचानक रख गया, कोई काँधे हाथ॥४
सात रंग की ओढ़नी रंगे नहीं रंगरेज।
रँग अठवाँ प्रेम का, ओ साईँ तू भेज॥५
नदी किनारों से कहे, अपने मन की बात।
यदि तू मेरा साथ दे, तो दिन क्या, क्या रात?६
मंद-मंद बहती हवा, सकल सृष्टि है मौन
धरती माँ की गोद में, निद्रारत है कौन॥७"
सद्भावी - डॉ० डंडा लखनवी
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0 # Shashipadha 2010-06-22 17:43
Bahut Bahut dhanyvaad aapka. Aapke sujhaav bahut hi achhe lage . Bhavishy men bhi is protsaahan ki aasha rakhoongi.

Saadar,

Shashi Padha
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0 # padm singh 2010-06-22 09:38
सुंदर दोहे हैं
डाक्टर गिरीश जी के सुझाव सुंदर हैं
दोहे मे यदि मात्राओं की व्यवस्था बिगड़ जाए तो त्रुटि मानी जाती है. यद्यपि शायरी मे शे'र मे मात्राओं की जगह रुक्न और बहर का ध्यान रखा जाता है
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0 # mehek 2010-06-22 11:49
behad sunder aur bhavpurn.
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0 # Aparna Bhatnagar 2010-06-24 10:22
bahut sundar rachna ke liye badhyi!
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0 # परमजीत बाली 2010-07-27 01:16
बहुत सुन्दर!!बधाई स्वीकारें।
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