धूप कणी (मुक्तक) - शशि पाधा

जिसकी लाली ओढ़ के, लाल हुआ कचनार
छलके उसकी गागरी, अँजुरी भर दो चार
सूना-सूना मन का घर, संशय थे अनेक
खोल झरोखा आन मिली धूप कणी की रेख
पल दो पल संताप से, मन क्यों करता रोष
जलती धरती देख के, बरसे शीतल ओस
सूरज रखूँ हाथ पे, दूर क्षितिज उड़ जाऊँ
दो पग सागर नाप लूँ, रूठा मन बहलाऊँ
कल किसी ने छोड़ा था, दोराहे पे साथ
अनजाना कोई रख गया, आज काँधे हाथ
सतरँगों की ओढ़नी, रँगे न रँगरेज
अठवाँ रँग जो प्रेम का, ओ साईँ तू भेज
नदी कहे किनारे से, मन की बात बताऊँ
तू जो चल दे सँग मेरे, मीलों बहती जाऊँ
धीमे -धीमे चली हवा, सारी सृष्टि मौन
थका बटोही सोया जो,धरती गोदी कौन
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उर्दू के सुप्रसिद्ध शायर औरंगज़ेब खान उर्फ क़तील शिफ़ाई का जन्म 24 दिसम्बर 1919 को पाकिस्तान के हज़ारा तहसील के हरीपुर में हुआ था। उर्दू गज़ल की दुनिया में अपना नाम उन्होंने अपने उस्ताद हकीम मोहम्मद ‘सिफिया’ के नाम पर शिफ़ाई रख लिया और क़तील उनका तखल्लुस बन गया किसका मतलब ‘वो जिसका कत्ल हो चुका’ है। इस तरह क़तील शिफ़ाई का जन्म हुआ।







Comments
इन्हें पढ़ कर सुखद अनुभूति हुई।
कुछ दोहों में पदों के थोड़ा परिवर्तन
से मात्राओं की व्यवस्था संतुलित हो
गई है और प्रभावोत्पादकता बढ
गई है। यथा-
"जिसकी लाली ओढ़ के, लाल हुआ कचनार।
छलकी उसकी गागरी, बस अँजुरी दो चार॥१
एकाकी-मन मन सदन में, संशय उगे अनेक।
खुली खिड़कियाँ आ मिली, धूप कणी की रेख॥२
करतल पर रवि को रखूँ, उड़ूं क्षितिज के पार।
नापूँ पग में सिन्धु को, मन के पंख पसार॥३
छोड़ा था कल किसी ने, दोराहे पे साथ।
आज अचानक रख गया, कोई काँधे हाथ॥४
सात रंग की ओढ़नी रंगे नहीं रंगरेज।
रँग अठवाँ प्रेम का, ओ साईँ तू भेज॥५
नदी किनारों से कहे, अपने मन की बात।
यदि तू मेरा साथ दे, तो दिन क्या, क्या रात?६
मंद-मंद बहती हवा, सकल सृष्टि है मौन
धरती माँ की गोद में, निद्रारत है कौन॥७"
सद्भावी - डॉ० डंडा लखनवी
Saadar,
Shashi Padha
डाक्टर गिरीश जी के सुझाव सुंदर हैं
दोहे मे यदि मात्राओं की व्यवस्था बिगड़ जाए तो त्रुटि मानी जाती है. यद्यपि शायरी मे शे'र मे मात्राओं की जगह रुक्न और बहर का ध्यान रखा जाता है
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